...............गतांक से आगे बढ़ाते हुए


विगत दो पोस्ट के माध्यम से मैंने परिचर्चा के माध्यम से ०९ प्रबुद्ध जनों के विचारों से आप सभी को रूबरू कराया विषय था हिंदी ब्लॉगिंग और आपकी सोच ? आईये इसी क्रम में कुछ और व्यक्तियों के विचारों से हम आपको रूबरू कराते हैं-




मेरे जैसे अनेक हैं, जो लेखन की दुनियां से पहले कभी जुड़े नहीं रहे। हम पाठक अवश्य रहे। शब्दों के करिश्मे से परिचित अवश्य रहे। पर शब्दों का लालित्य अपने विचारों के साथ देखने का न पहले कभी सुयोग था और न लालसा भी। मैं अपनी कहूं - तो रेलवे के स्टेशनों और यार्ड में वैगनों, कोचों, मालगाड़ियों की संख्या गिनते और दिनो दिन उनके परिचालन में बढ़ोतरी की जुगत लगाते जिंदगी गुजर रही थी। ऐसा नहीं कि उसमें चैलेंज की कमी थी या सृजनात्मकता की गुंजाइश कम थी। फिर भी मौका लगने पर हम जैसों ने ब्लॉगरी का उपयोग किया और भरपूर किया। कुछ इस अन्दाज में भी करने की हसरत रही कि हम कलम के धनी लोगों से कमतर न माने जायें। ब्लॉगिंग तकनीक ने हम जैसे लेखन से दूर रहे को अभिव्यक्ति तथा सृजनात्मकता के प्रयोग के अवसर दिये हैं। और वह सृजनात्मकता शुद्ध लेखन से किसी तरह कमतर नहीं है। इसे स्वीकार न करने वालों को अपने को श्रेष्ठतर बताने के लिये केवल वक्तव्य देना पर्याप्त नहीं होगा। कड़ी मेहनत करनी होगी।
  • ज्ञान दत्त पाण्डेय
( भारतीय रेल में कार्यरत और हिंदी ब्लॉगिंग में सकारात्मक लेखन के सूत्रधार)

My Photoहिंदी ब्लॉगिंग से जुड़े लोगों को इस बात से बड़ी राहत मिलती है कि उनकी भाषा में चिट्ठाकारी तेजी से विकसित हो रही है। चार पांच साल पहले हिंदी ब्लॉग की संख्या उंगलियों पर गिनी जाने लायक थी, लेकिन आज यह तादाद बीस हजार से अधिक है। सक्रिय ब्लॉगरों की संख्या भले इतनी न हो, पर कई ब्लॉगर पूर्ण समर्पण और निष्ठा से हिंदी ब्लागिंग का परचम लहराने में जुटे हैं।लेकिन उन्नति के तमाम कारकों के बीच एक सवाल अहम है कि हिंदी ब्लॉगर आर्थिक रूप से लाभान्वित हो रहे हैं ?

  • पियूष पाण्डेय
( वहुचर्चित साईबर पत्रकार )


चिट्ठाकारिता !  मानव अभिव्यक्ति की संभावनाओं से लबरेज एक अभिनव  पहल -अपने विकास क्रम में मानव ने संचार के आदि हुँकरणों से आगे बढ़ते हुए भाषा बोली और फिर लिपियाँ सृजित की ....अभिव्यक्ति की दुनिया में मुद्रण साहित्य ने मानों एक क्रान्ति ला दी ....और अब डिजिटल अभिव्यक्ति की नयी क्रान्ति का नाम है चिट्ठाकारिता!
इसने सबसे बाजी मार ली है -दुतरफा त्वरित संवाद ,बेडरूम  से टायलेट तक इसकी सहज लोकगम्यता और निरन्तरता ने बाकी के संचार के माध्यमों को काफी पीछे छोड़ दिया है ....ज्यों ज्यों अंतर्जाल की जन उपलब्धता बढ़ती जायेगी लोगों के अभिव्यक्ति  का यह माध्यम विस्तार पाता चला जायेगा -इस डिजिटल वामन ने अपने ब्रह्माण्ड व्यापी 'पूत के पाँव ' दिखाने शुरू कर दिए हैं ......ब्लॉग और सोशल नेट्वर्किंग साईटें आज लोकतंत्र की व्हिसिल ब्लोवर और रहनुमा बन कर भी उभर रही हैं -अफ्रीकी और खाड़ी के देशों में हुई जन क्रान्तियाँ इनकी ताकत दिखा रही हैं .....जनता की आवाज को और बुलंदी देने में ये सहायक बन रही हैं -मनुष्य की अभिव्यक्ति कभी शायद  इतना समवेत सिनर्जिस्टिक  और पावरफुल कभी नहीं थी .....जो लोग इसकी अहमियत को नकार रहे हैं वे अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं या तो आत्म मुग्धता में उनकी आँखें मुद गयी हैं!
  • डा. अरविन्द मिश्र 
(वहुचर्चित चिट्ठाकार और अध्यक्ष: साईंस ब्लॉगर असोसिएशन ) 


मैंने जब ब्लॉग लिखना शुरू किया था तो देखता था-सबसे ज़्यादा पसंद वाले कॉलम में ऊपर की पांच छह पोस्ट सिर्फ धर्म को लेकर एक-दूसरे पर निशाना साधने वाली ही होती थीं...या फिर किसी पोस्ट में किसी ब्ल़ॉगर का नाम लेकर ही उसे ललकारा जाता रहता था...ये सब बिल्कुल बंद तो नहीं हुआ है, पहले से कम ज़रूर हो गया है...अब अलग-अलग मुद्दों पर जमकर लिखा जा रहा है...ये बड़ा सकारात्मक बदलाव है...हमें अपने ब्लॉग्स के लिए पाठक तभी ज़्यादा मिलेंगे जब उन्हें हमारे लिखे में विभिन्नता और गुणवत्ता मिलेगी...मुझे महसूस हो रहा है...शायद आपको भी हो रहा हो...न जाने क्यों मुझे लग रहा आने वाला साल हिंदी ब्ल़ॉगिंग के लिए कई खुशियां लेकर आने वाला है...इसकी सुगबुगाहट शुरू भी हो चुकी है..!

  • खुशदीप सहगल
(विख्यात मीडियाकर्मी एवं ब्लॉगर )

हिन्दी ब्लॉगिंग में नित बढ़ते ब्लॉग इस बात का कतई द्योतक नहीं हैं कि इससे किसी प्रकार की सामाजिकता, सांस्कृतिकता अथवा भाईचारे में वृद्धि हो रही है। अभी हम ब्लॉग-विकास के उस दौर में हैं जहां स्वयं को स्थापित किया जाना होता है। इसी कारण से ब्लॉग-लेखन के रूप में हमें अभी रोजनामचा सा दिखता है या फिर आपसी विद्वेष। अभी ब्लॉग लेखन में सक्रिय लोग, चाहे वे कितने भी प्रख्यात हों, इसको गहराई से आत्मसात नहीं कर सके हैं। साहित्य के नाम पर, भाषा के नाम पर विकास की बात तो बाद में हो अभी हम अभिव्यक्ति के नाम पर ही कमजोर हैं। इसका एक प्रमुख कारण नामचीन ब्लॉग-लेखकों द्वारा सामयिक विषयों से इतर रोजमर्रा की घटनाओं को प्रमुखता से पोस्ट किया जाना है। एकाधिक ब्लॉग-लेखक ही हैं जो गम्भीरता से ब्लॉग के मर्म को समझकर इस दिशा में कार्य कर रहे हैं। इसके अलावा देखा जाये तो सीखने-सिखाने के इस दौर में ब्लॉग-लेखकों को लेकर भी जबरदस्त गुटबाजी देखने को मिल रही है, जो विकास को नहीं गिरावट को दर्शाती है। अभी बहुत समय है और इस समय ब्लॉग के द्वारा किसी प्रकार की राह निर्मित कर देने की भविष्यवाणी करना अथवा गर्वोक्ति महसूस करना शेखचिल्लीपना ही कहा जायेगा।

  • डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
(हिंदी के आलोचक, समीक्षक, चुनाव विश्लेषक, शोध निदेशक)

.........जारी है परिचर्चा, मिलते हैं एक विराम के बाद 

27 टिप्पणियाँ:

  1. आदरणीय रविन्द्र प्रभात जी
    ब्लॉग जगत की चर्चित प्रतिभाओं के विचारों को एकत्रित करने , ब्लॉगिंग के प्रति उनका नज़रिया और सोच को प्रकाशित करने के लिए आपका तहे दिल से आभार ...आपका यह प्रयास मेरे लिए लाभदायक है ...आपका पुनः आभार

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  2. अनावश्यक चिंता करने की ज़रूरत नहीं है।
    बहुत उज्ज्वल भविष्य है। कई नामी हिन्दी के अखबार के सम्पादक तक ने ब्लॉग पर लिखना शुरु कर दिया है। उन्होंने भी इसके भविष्य और महत्त्व का अकलन कर लिया है।

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  3. रविन्द्र प्रभात जी
    ...उज्ज्वल भविष्य है

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  4. मैं तो पूरी तरह निश्चिन्त हूँ, आपने कोचिंग सेंटर में ब्लोगिंग का प्रशिक्षण भी प्रदान करने वाला हूँ

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  5. आपका यह प्रयास अत्यन्त सराहनीय है रवीन्द्र जी!

    पियूष पाण्डेय जी का प्रश्न "लेकिन उन्नति के तमाम कारकों के बीच एक सवाल अहम है कि हिंदी ब्लॉगर आर्थिक रूप से लाभान्वित हो रहे हैं?" भी सर्वथा उपयुक्त है। किन्तु हिन्दी ब्लोगिंग में जब तक लाखों की संख्या में पाठकों को खींच कर लाने की क्षमता नहीं आ पाएगी तब तक उससे आर्थिक लाभ का सपना देखना अर्थहीन ही सिद्ध होती रहेगी।

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  6. परिचर्चा का विचार अच्‍छा लगा। बेहतर होता कि आप कुछ चार-पांच सवाल भी सामने रखते ताकि उन पर सिलसिलेवार अलग अलग लोगों के मत पढ़ने को मिलते। अभी यह अपनी अपनी ढपली अपना अपना राग की तरह चल रही है।

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  7. सब के विचारो को इस अंदाज़ में हम सब तक पहुँचाने के लिए आपका बहुत बहुत आभार !

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  8. ब्लागरी पर ब्लागरों के विचार का यह आयोजन सुंदर और महत्वपूर्ण है।

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  9. हिंदी ब्लोगिंग का अभी शैशव काल अवश्य ही है लेकिन इसकी परवरिश से इतका विकास अच्छा होने की संभावना है. हम अंग्रेजी की बराबरी नहीं कर सकते हैं लेकिन आज नहीं तो कल अपनी संस्कृति की विविधता में समाहित एकता के चलते इसको इतना समृद्ध बना लेंगे की हमें खुद ही आश्चर्य होगा. लेखन के विभिन्ना आयाम यहाँ मौजूद हैं और उसके लिए सतत प्रयत्नशील व्यक्तित्वों की भी कमी नहीं है.

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  10. ब्लोगरों की तथा ब्लोगिंग की जब भी चर्चा होगी रविन्द्र प्रभात जी का नाम जरूर आयेगा उसमे....शानदार प्रयास है आपका ब्लोगिंग को एक सार्थक मुकाम देने के दिशा में....

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  11. इस अंक के लिए आभार -
    मेरी विचार प्रस्तुति में बाथरूम को बेडरूम पढ़ा जाय
    और खादी को खाड़ी

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  12. सार्थक ब्लागिंग व इसके भविष्य के प्रति जानकारों का नजरिया एक ही सूत्र में पिरौने के आपके इस प्रयास हेतु आभार...
    श्री राजेश उत्साही के विचार भी इसमें समायोजित करने योग्य लगे ।

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  13. निश्चित रूप से हिंदी ब्लोगिंग आज के दौर में प्रगति के मार्ग पर अग्रसर है. हालाँकि इसमें सुधार की आवश्यकता भी है. अधिकतर ब्लॉग लेखक आज भी निर्णय नहीं ले पाते की उन्हें क्या लिखना और क्या नहीं. शुरुआत में मैं खुद नहीं जानता था की ब्लोगिंग क्या होती है और कैसे होती है. एक दिन मजाक मजाक में ही ब्लॉग बना लिया और जो भी मन में आया लिखना शुरू कर दिया, हा मेरे अन्दर सीखने की ललक थी लिहाजा कितने ब्लॉग पर भ्रमण किया और लोंगो को पढ़ा. इस दौरान मुझे जो सबसे बुरा लगा वह यह था की कुछ लोग अभिव्यक्ति की स्वंतंत्रता का नाजायज प्रयोग कर रहे हैं. मुझे यह देखकर अफ़सोस हुआ की ब्लॉग को धर्म की बुराई का मार्ग भी बना लिया गया है. खुद को अच्छा बताना और दूसरे को बुरा कहने की प्रवित्ति कई लोंगो में देखी. यहाँ तक की कमेन्ट में भी अभद्र शब्दों का प्रयोग हो रहा है. लाबोलुआब यह है की हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार भले ही है परन्तु दूसरे की भावनाओ का भी ख्याल रखना चाहिए. भले ही हम सामने नहीं होते पर यह अवश्य सोचना होगा की जो लोग इन बातो को पढ़ते होंगे उनके मन में कैसी भावना जन्म लेती होगी. ब्लॉग आपसी संबंधो को मजबूत करने साधन भी है. हमें चाहिए की ऐसे लेख लिखे जिससे समाज व देश का हित हो. यदि हम दूसरो को नीचा दिखाने, खुद को बड़ा बताने की प्रवित्ति नहीं छोड़ेंगे तो निश्चित रूप से हम किसी न किसी रूप में समाज का अहित ही करेंगे. अच्छी प्रस्तुति के लिए आभार.


    भारतीय ब्लॉग लेखक मंच
    डंके की चोट पर

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  14. परंपरागत मीडिया से लोगों का विश्वास उठ रहा है और ब्लॉग पर निगाहें टिकने लगी हैं.भविष्य हिंदी ब्लॉग्गिंग का बहुत उज्जवल है.

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  15. ब्लोगिंग के उज्जवल भविष्य की कामना करते हैं

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  16. बहुत अच्छा लगा सबके विचार जानना.

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  17. रवींद्र जी,
    हम जो ब्लॉग पर लिखते है, वो आत्मसंतोष के लिए है...लेकिन आप जो महत्ती काम कर रहे हैं वो कालजयी है...आने वाले वर्षों में कोई भी हिंदी ब्लॉग का इतिहास जानना चाहेगा, उसके शैशवकाल, उत्तरोत्तर विकास के बारे में समझना चाहेगा, उसके लिए आपका काम आपके नाम की तरह सूर्य का प्रभात सापित होगा...

    मेरे विचार में आने वाले साल की जगह यही साल कर लें...क्योंकि ब्लॉगिंग उम्मीद से जल्दी युवा हो रही है...

    जय हिंद...

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  18. सापित की जगह साबित पढ़ें...

    जय हिंद...

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  19. रवीन्द्र भाई, वस्तुत: ब्लोगिंग या चिट्ठाकारिता सूचना तकनीकी जगत में साइंस की देन है जिसका भरपूर फायदा उठाया जा सकता है... कुछ लोग शुतुरमुर्ग स्वांग रच कर इसकी उपेक्षा करते हैं। आप इस विधा को और परिष्कृत एवं समृद्ध कर रहे हैं, आपके साथ हमारी शुभकामनाएं हैं।

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  20. सब के विचारो को हम तक पहुँचाने के लिए आपका बहुत बहुत आभार !

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  21. बेहतरीन काम के लिए आभार आपका !

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  22. जारी रहे बस सस्नेह जारी रहे

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  23. .
    सत्य है.. गँभीर एवँ सार्थक ब्लॉगिंग का युग सम्मुख खड़ा है, आवश्यकता आगे बढ़ कर स्वागत करने की है !

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